2025 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार : क्वांटम दुनिया को असली रूप में दिखाने वाले वैज्ञानिकों को सम्मान
- bpsinghamu
- Nov 21, 2025
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2025 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार तीन महान वैज्ञानिकों — जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस — को दिया गया है। यह पुरस्कार उन्हें इसलिए मिला क्योंकि इन वैज्ञानिकों ने क्वांटम यांत्रिकी के नियमों को बड़े और दिखाई देने वाले सिस्टमों में लागू करके दिखाया, जिन्हें हमारी आँखों से भी देखा जा सकता है। इससे पहले क्वांटम सिद्धांत केवल सूक्ष्म कणों जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और परमाणु तक सीमित समझे जाते थे।
विशेष रूप से, यह पुरस्कार इस वर्ष के लिए और भी महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि 2025 को अंतर्राष्ट्रीय क्वांटम प्रौद्योगिकी वर्ष घोषित किया गया है, जिससे यह उपलब्धि क्वांटम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के वैश्विक महत्व को रेखांकित करती है।इनके शोध ने विज्ञान की समझ को गहरा किया और आधुनिक तकनीक जैसे क्वांटम कंप्यूटर, क्वांटम सेंसर और क्वांटम कम्युनिकेशन के विकास की नींव रखी।
क्वांटम यांत्रिकी क्या है?
क्वांटम यांत्रिकी भौतिकी की वह शाखा है जो बताती है कि परमाणु और उपपरमाण्विक कण जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन किस तरह व्यवहार करते हैं यह नियम हमारी रोज़मर्रा की दुनिया से बहुत अलग हैं। उदाहरण के लिए:
• कोई कण एक ही समय में दो जगह मौजूद हो सकता है:
क्वांटम यांत्रिकी में यह संभव है कि एक कण, जैसे इलेक्ट्रॉन, किसी निश्चित समय पर एक ही स्थान पर न होकर एक साथ कई जगहों पर होने की संभावना रखता है। इसे सुपरपोज़िशन (Superposition) कहते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति मापने की कोशिश करें, तो वह सिर्फ़ एक जगह पर पाया जाएगा, लेकिन मापने से पहले उसकी तरंग-संभाव्यता (wavefunction) कई संभावित स्थानों में फैली होती है। यह नियम हमारी रोज़मर्रा की दुनिया के अनुभव से बिल्कुल अलग है, क्योंकि क्लासिकल भौतिकी में कोई भी वस्तु केवल एक ही स्थान पर हो सकती है।
• कोई कण ऊर्जा अवरोध को पार कर सकता है,भले उसके पास पर्याप्त ऊर्जा न हो:
इससे तात्पर्य है क्वांटम टनलिंग (Quantum Tunneling) से। क्लासिकल नियमों के अनुसार, यदि किसी कण की ऊर्जा किसी बाधा (barrier) को पार करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो वह इसे पार नहीं कर सकता। लेकिन क्वांटम यांत्रिकी में कण की तरंग-संभाव्यता के कारण, वह बाधा को “टनलिंग” करके पार कर सकता है। यह अल्फा क्षय (alpha decay) में विशेष रूप से देखा गया है, जहाँ अल्फा कण नाभिक से बाहर निकल जाते हैं, भले ही उनकी ऊर्जा नाभिकीय बाधा से कम हो। इस प्रभाव को प्रयोगात्मक रूप से हमारी लैब में ²⁴¹Am स्रोत का उपयोग करके भी देखा और मापा जा सकता है।
• किसी प्रणाली की ऊर्जा लगातार नहीं बदलती, बल्कि निर्धारित स्तरों (energy levels) पर रहती है, जिसे ऊर्जा का क्वांटीकरण (Quantization of Energy) कहा जाता है:
क्वांटम सिद्धांत के अनुसार, किसी प्रणाली (जैसे परमाणु, इलेक्ट्रॉन, या सुपरकंडक्टिंग सर्किट) की ऊर्जा सतत नहीं होती, बल्कि कुछ निश्चित और विशिष्ट स्तरों पर ही संभव होती है। इसे Energy Quantization कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप इलेक्ट्रॉन को परमाणु में ऊर्जावान अवस्था (excited state) में ले जाते हैं, तो वह केवल कुछ निश्चित ऊर्जा स्तरों पर ही हो सकता है, बीच के स्तरों पर नहीं। इसी सिद्धांत के आधार पर कई आधुनिक तकनीकें जैसे क्वांटम कंप्यूटर, क्वांटम सेंसर और लेजर विकसित हुए हैं।
क्वांटम यांत्रिकी की नींव 1900 में मैक्स प्लांक ने रखी थी, जब उन्होंने ऊर्जा के क्वांटीकरण का विचार दिया। इसके बाद, अल्बर्ट आइंस्टीन, निल्स बोहर, वर्नर हाइजेनबर्ग और एर्नेस्ट रदरफोर्ड ने इसे विकसित किया। इन वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया कि भौतिकी के नियम केवल बड़ी चीज़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सूक्ष्म कणों की दुनिया में भी लागू होते हैं।
क्वांटम टनलिंग और उसका इतिहास
क्वांटम टनलिंग (Quantum Tunneling) का विचार पहली बार 1928 में जॉर्ज गमोव (George Gamow) ने प्रस्तुत किया। गमोव ने नाभिकीय भौतिकी में यह समझाया कि अल्फा कण (α-particles) रेडियोधर्मी क्षय के दौरान बिना पर्याप्त ऊर्जा के नाभिक से बाहर निकल सकते हैं। गमोव ने यह सिद्धांत पेश करने के लिए श्रोडिंगर समीकरण और क्वांटम यांत्रिकी की तरंग व्यवहार (wave behavior) का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि नाभिक के अंदर कणों की तरंग-संभाव्यता (wavefunction) इतनी होती है कि कभी-कभी वे ऊर्जा अवरोध (potential barrier) को “टनलिंग” करके पार कर सकते हैं। इसका मतलब है कि नाभिक में मौजूद कण हमेशा पूरी तरह से अवरोधित नहीं रहते, और क्वांटम नियम उन्हें कभी-कभी बाधा पार करने की अनुमति देते हैं। गमोव ने विशेष रूप से इसे अल्फा क्षय और नाभिकीय विघटन में लागू किया। उनके सिद्धांत ने यह समझाने में मदद की कि क्यों और कैसे अल्फा कण क्लासिकल भौतिकी के नियमों के विपरीत, अपेक्षित समय से पहले नाभिक को छोड़ सकते हैं।
यह उदाहरण दर्शाता है कि बुनियादी शोध (basic research) कभी-कभी तुरंत व्यावहारिक परिणाम नहीं देता। गमोव के विचार पर आधारित प्रयोग और वास्तविक बड़े सिस्टम में लागू करना लगभग 100 साल बाद नोबेल पुरस्कार देने जैसा बड़ा परिणाम लाया। इस तरह, मूल शोध का महत्व और उसके दीर्घकालिक प्रभाव कभी-कभी वर्षों या दशकों बाद ही प्रकट होते हैं।
पहले यह प्रभाव केवल सूक्ष्म परमाणु कणों में देखा गया। लेकिन जॉन क्लार्क, मिशेल डेवोरेट और जॉन मार्टिनिस ने इसे पहली बार बड़े और प्रयोगशाला में दिखाई देने वाले सिस्टमों में प्रदर्शित किया। उन्होंने साबित किया कि क्वांटम प्रभाव केवल सूक्ष्म दुनिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बड़े सिस्टम में भी दिखाई और नियंत्रित किए जा सकते हैं। इस तरह उन्होंने गमोव के विचार को आधुनिक प्रयोगात्मक तकनीक में लागू किया।
इन वैज्ञानिकों ने क्या किया?
1980 के दशक में, इन वैज्ञानिकों ने सुपरकंडक्टिंग सर्किट (Superconducting Circuit) में प्रयोग किए। सुपरकंडक्टिंग सर्किट ऐसे इलेक्ट्रॉनिक चिप्स हैं जिनमें विद्युत धारा बिना किसी प्रतिरोध के बहती है।
इन प्रयोगों में उन्होंने दो मुख्य क्वांटम प्रभावों को देखा:
क्वांटम टनलिंग (Quantum Tunneling):
उन्होंने देखा कि सर्किट में धारा एक ऊर्जा अवरोध को पार कर गई, जो सामान्य नियमों के अनुसार असंभव था। इसे समझने के लिए यह सोचिए कि आप एक छोटी कार को बिना पर्याप्त शक्ति के पहाड़ी पर चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सामान्य रूप से यह असंभव है, लेकिन अगर कार क्वांटम नियमों के अनुसार चल रही हो, तो वह “टनलिंग” करके पहाड़ी पार कर सकती है।
ऊर्जा का क्वांटीकरण (Quantization of Energy):
उन्होंने पाया कि सर्किट की ऊर्जा लगातार नहीं बदलती बल्कि निर्धारित स्तरों पर रहती है।इसका मतलब है कि यह सिस्टम केवल कुछ विशेष आवृत्तियों (frequencies) की ऊर्जा को ही अवशोषित करता है।
इन प्रयोगों ने साबित किया कि क्वांटम प्रभाव बड़े सिस्टम में भी देखे जा सकते हैं, और इन्हें नियंत्रित और मापा जा सकता है।
हमारे प्रायोगिक न्यूक्लियर फिजिक्स लैब, फिजिक्स विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में छात्र स्वयं अपने हाथों से प्रयोग करके यह देखते हैं कि अल्फा कण (α-particles) ऊर्जा अवरोध (potential barrier) से पार कर जाते हैं, भले ही उनकी ऊर्जा उस अवरोध को पार करने के लिए पर्याप्त न हो। इन प्रयोगों में Americium-241 (²⁴¹Am) अल्फा स्रोत का उपयोग किया जाता है, जिसकी ऊर्जा और विकिरण की विशेषताओं के माध्यम से छात्रों को अल्फा क्षय और क्वांटम टनलिंग का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। छात्र इस स्रोत से उत्सर्जित अल्फा कणों के ऊर्जा स्पेक्ट्रम को मापते हैं, जो प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करता है कि क्वांटम टनलिंग वास्तव में होती है। इस तरह छात्र क्वांटम सिद्धांत को प्रयोगात्मक रूप में अनुभव और स्वयं माप सकते हैं।
इन खोजों का महत्व
इन खोजों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि अब हम क्वांटम सिद्धांतों को प्रयोगशाला में बड़े सिस्टम में लागू और नियंत्रित कर सकते हैं। यह खोज क्वांटम कंप्यूटर बनाने का आधार बनी। क्वांटम कंप्यूटर पारंपरिक कंप्यूटरों की तुलना में लाखों गुना तेज़ गणनाएँ कर सकते हैं। इसके अलावा, ये खोजें क्वांटम सेंसर और क्वांटम कम्युनिकेशन जैसी भविष्य की तकनीकों के लिए मार्ग खोलती हैं। इसका मतलब है कि अब हम न केवल क्वांटम सिद्धांत को समझ सकते हैं, बल्कि इसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों जैसे डेटा सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु मॉडलिंग और नई दवाओं की खोज में इसका लाभ उठा सकते हैं।
इन वैज्ञानिकों का परिचय
जॉन क्लार्क: यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में प्रोफेसर, और सुपरकंडक्टिंग इलेक्ट्रॉनिक्स के “गॉडफादर” कहे जाते हैं।
मिशेल एच. डेवोरेट: फ्रांस में जन्मे, येल यूनिवर्सिटी में अप्लाइड फिजिक्स के प्रोफेसर रहे।
जॉन एम. मार्टिनिस: कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, सैंटा बारबरा में प्रोफेसर, और गूगल की क्वांटम एआई टीम के प्रमुख सदस्य रहे।
इन तीनों ने सैद्धांतिक क्वांटम भौतिकी को प्रयोगात्मक हकीकत में बदलकर दिखाया और विज्ञान के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।
निष्कर्ष
इन वैज्ञानिकों ने साबित किया कि क्वांटम यांत्रिकी केवल समीकरण या किताबों तक सीमित नहीं है।इसे देखा, मापा और नियंत्रित किया जा सकता है। उनके काम ने विज्ञान को सूक्ष्म से दृश्य की ओर बढ़ाया और आज यह खोज हमारे भविष्य की तकनीक, जैसे क्वांटम कंप्यूटर, क्वांटम सेंसर और क्वांटम कम्युनिकेशन की नींव बन चुकी है। उनकी खोज ने यह भी दिखाया कि अदृश्य क्वांटम दुनिया को वास्तविक आकार में देखा और इस्तेमाल किया जा सकता है। यही इस शोध की असली महत्ता है।


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