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क्वांटम दुनिया हमारी रोज़मर्रा की दुनिया से बिल्कुल अलग है!

क्वांटम दुनिया में कण एक ही समय में दो जगह हो सकते हैं। वे ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उनका अस्तित्व एक निश्चित बिंदु पर नहीं, बल्कि एक वेवफंक्शन के रूप में फैला होता है, जो बताता है कि कण कहाँ–कहाँ मिलने की संभावना है। इसी कारण वे एक साथ कई तय ऊर्जा स्तरों में रह सकते हैं , इसे सुपरपोज़िशन कहा जाता है। वे ऊर्जा की बड़ी बाधाएँ भी बिना किसी बल के पार कर लेते हैं।क्योंकि उनकी वेवफंक्शन बाधा के भीतर और उसके पार तक फैलती है, और इसी फैलाव की वजह से कण के पास बाधा को पार करने की एक निश्चित प्रायिकता होती है। इसे क्वांटम टनलिंग कहा जाता है, जिसे पहली बार George Gamow ने अल्फा क्षय समझाने के लिए सफलतापूर्वक उपयोग किया था।


लंबे समय तक यह दुनिया अदृश्य और रहस्यमय मानी जाती थी। लोग सोचते थे कि यह केवल इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और छोटे कणों तक सीमित है। लेकिन वैज्ञानिकों ने धीरे–धीरे यह समझाया कि क्वांटम नियम बड़े सिस्टमों में भी काम करते हैं। सुपरकंडक्टिंग सर्किटों पर हुए प्रयोगों ने दिखाया कि क्वांटम प्रभावों को हम देख सकते हैं, नाप सकते हैं, और कंट्रोल भी कर सकते हैं। यह विज्ञान में एक बड़ा मोड़ था। पहली बार अदृश्य क्वांटम दुनिया को वास्तविक रूप में महसूस किया गया।


यही सिद्धांत आज की तकनीकों की नींव हैं—क्वांटम कंप्यूटर, क्वांटम सेंसर और सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन। ये तकनीक भविष्य की दवा-खोज, मौसम और जलवायु मॉडलिंग, अंतरिक्ष मिशन और वैज्ञानिक अनुसंधान को नए रास्ते देंगी। क्वांटम टनलिंग का विचार सबसे पहले प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी George Gamow ने दिया। उन्होंने समझाया कि कण ऊर्जा बाधा को पार करते हुए ऐसे बाहर निकल सकते हैं, मानो वे उसके आर-पार “सुरंग बनाकर” निकल गए हों, जबकि असल में यह उनकी वेवफंक्शन के फैलाव और प्रायिकता का परिणाम होता है, न कि किसी वास्तविक सुरंग का। उनके सिद्धांत ने हमें अल्फा क्षय, तारों के अंदर होने वाले नाभिकीय संलयन और आधुनिक क्वांटम उपकरणों को समझने में मदद दी।


हमारी अपनी प्रयोगशाला में भी छात्र ²⁴¹Am स्रोत का उपयोग करके अल्फा कणों को ऊर्जा बाधा पार करते हुए देखते हैं। यह क्वांटम टनलिंग का सीधा प्रमाण है। विद्यार्थी अपनी आँखों से वह प्रक्रिया देखते हैं जिसे एक समय केवल गणितीय विचार माना जाता था। क्वांटम विज्ञान हमें सिखाता है कि प्रकृति की गहरी सच्चाइयाँ अक्सर छिपी होती हैं। लेकिन जिज्ञासा, प्रयोग और सतत प्रयास इन्हें उजागर कर देते हैं। आज का शोध केवल प्रयोगशाला की दीवारों तक सीमित नहीं है, यह उस भविष्य की नींव है जिसे आने वाली पीढ़ियाँ आगे बढ़ाएँगी।


लेखक : यह ब्लॉग प्रोफेसर बी. पी. सिंह द्वारा लिखा गया है। वे एक प्रायोगिक नाभिकीय भौतिक विज्ञानी हैं, और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU), भौतिकी विभाग में कार्यरत हैं।

 
 
 

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